Wednesday, June 30, 2010

एक अनोखी ममता सहारा समय न्यूज़

हम मानव आजकी इस भाग दौड़ वाली जिंदगी में भले ही मानवता छोड़ चुके हैं, लेकिन यह बेजुबान जिनका कोई भी नाता नहीं वो मानवता का फुर्ज़ बखूबी निभा रहे हैं । इंसानो को मिल रही हैं जानवरों से मानवता की सिख इसे तो हम यही कहेंगे आप क्या कहेंगे? अपनी राय पोस्ट करे ।

कठा एक आदिवासी परम्परा

महाराष्ट्र के अहमदनगर जिलेमे कवठेवाडी यह पहाड़ी इलाका हैं । कई सालोसे यहाँ कठा यह आदिवासीयों की अनोखी परम्परा मन्नत के तौर पर निभाई जा आ रही हैं , मई महीने में अक्षय तृतीया की रात को सर पर मटके में सुलगती आग को उठाकर बिरोबा भगवान के मंदिरके फेरे लगाये जाते हैं । देखने वालोंके अंग पर रौगठे खड़े हो जाते हैं । यह विडियो आप को कैसा लगा आपनी राय पोस्ट करे ........................................................

Tuesday, May 4, 2010

श्रद्धा एक दस साल की पाचवी कक्षाकी छात्र जो दोनों हातोसे और एक पैरसे विकलांग हैं । भगवान ने दी हुई कमी पर हामी होकर एक नये उमंग के साथ अपना जीवन जी रही हैं । बचपनसे अंग्रेजी माध्यम मी रूचि रखने वाली यह नन्ही सी जान अब शिरडी साईबाबा इंग्लिश स्कूल में पाचवी से छटवी कक्षामे गयी हैं। बहोत ही गरीब घर में जन्मी इस नन्हीसी जान को कुदरत ने दोनों हतोकी उँगलियाँ और एक पैर न देकर कहर ढहाया हैं । लेकिन कहेते हैं ना जिसने जन्म दिया हैं वो उपरवाला ही जिनकी ताकद भी देता हैं ठीक उसी प्रकार श्रद्धा भी अपनी होशियारी के बलबूते पर कामयाबी हासिल कर जिलेकी भाग दोड संभालना यानि कलेक्टर बनना चाहती हैं ।लेकिन बोहत ही गरीब घर में जन्मी इस नन्ही जान इस स्पर्द्धा वाली दुनियामे बड़ी हिम्मत और आत्मविश्वास के लढ़ रही हैं . गरीबी की वजहसे अंग्रेजी माध्यम की सभी महंगी किताबे न लेकर अपनी सहेलियोंसे कुछ किताबे लेकर इसने पाचवी कक्षा में स्कूल में तीसरा नंबर हासिल कर ड्रोविंग में भी काफी नंबर हासिल कर चुकी हैं । विकलांग होने के बावजूद घर के सभी काम वो बड़ी चतुराई से करती हुई दिखाई देती हैं । सरकारने तो विकलांगो के लिए कई सारी योजनाये शुरू की हैं । लेकिन वो सब कितने ठीक तरीकेसे उनके पास पहुचती हैं इसका आभास श्रद्धा को देखकर होता हैं । हाल ही में श्रद्धा को महाराष्ट्र के विदधी और न्याय मंत्री ने शिरडी के साईं बाबा संस्थान द्वारा पढाई के लिए गोद लिया हैं एसी बात सामने आ रही है । लेकिन वाकई संस्थान कितने जल्द कागजाती कारवाही पूरी करेगा यह तो आने वाला समय ही दिखा देगा। लेकिन मंत्री साहब की घोषणा से श्रद्धा को एक नई आशा मिली हैं यह उसके मासूम चेहरे से साफ दिखाई दे रहा हैं । पुरे देश में आज भी एसी कई श्रद्धा हैं जिन्हें किसी ना किसी के मदत की जरूरत हैं ........ क्या शायद वो आप हो ? ................................................. सुनील दवंगे सहारा समय शिरडी ............................

Thursday, April 15, 2010

महाराष्ट्र में बे वक्त होने वाली बरसात ने परेशान किया हैं कभी पूरा राज्य सुखा पड़ा होता हैं तो कभी कभार बे वक्त सब जगहों पर पानी ही पानी । इस बे वक्त आनेवाले बरसात ने जन जीवन तहस नहस कर दिया हैं । भारत एक कृषि प्रधान देश हैं लेकिन इस सूखे और बेवक्त बरसात उपरसे महगाई ने मानो आम जनता के साथ साथ किसनोकी वही कमर तोड़ दी कही पर तो इस बरसात का फायदा होता हैं तो कही पर भारी मात्र में नुकसान , कुदरत के इस कहर के लिए किसी न किसी हद तक हम भी जिमेदार हैं । यह जानते हुए भी दुनिया का सबसे स्वार्थी जिव इन्सान पीछे नहीं हटता। और फिर कुदरत को ही दोष देता हैं
शिर्डी से सुनील दवंगे समय मुंबई

Wednesday, April 14, 2010

सहारा समय न्यूज़ ९ करोड़ ९ लाख ९ दिनों में साईं बाबा के तिजोरी में

शिरड़ी के साईं बाबाकी हुंडी में नये सालकी छुटीयोमे ९ दिनोमे ९ करोड़ ९ लाख रुपया निकला यह एक जादुई आकड़ा बताया जा रहा हैं । साईं बाबाने अपने महा निर्वाण के समय लक्ष्मी बाई शिंदे को भी ९ चदिके सिक्के दिए थे इस लिए यह आकड़ा बोह्थी शुभ मन जाता हैं ।
जानवर हो या इन्सान हर किसीको जन्म के बाद जिनके लिए प्रकुर्तिसे लढनेकी शक्ति माँ की कोक से मिलती है . इसी प्रकार अहमदनगर जिलेके संगमनेर में खांडवा गाव में तिन तेंदुवेके नवजात शिशु कई दिनोसे कड़ी धुपमें प्रकृति से माँ के बिना जीवन जीने के लड़ रहे हैं । एक किसान की खेतिमे गंनेकी फसल कटते हुए ये तिन प्यारे शावक मिले । अपनी माँ के बिछड़ने के बाद तीनो शावक मायूस दिखाई दे रहे हैं । तो दूसरी तरफ इनको अपनी माँ से मिलाने के लिए किसान जी तोड़ मशागत कर रहे हैं । लेकिन शावको की माँ डर के मारे इनसे मिलने नहीं आ रही हैं । यह किसान इन शावको को अपने बच्चे जैसा प्यार कर हैं । लेकिन कोई कितना भी प्यार करे माँ की ममता नहीं दे सकता क्यों की दुनिया ने सबसे गहरा रिश्ता होता हैं माँ और बेटे का इसकी का अनुभूति यह दिखाई पड़ती हैं । जंगल में पीनेका पानीकी किल्लत की वजहसे अब वन्य जिव लोक बस्ती की और चल पड़े हैं । इसीलिए अब एन वन्य जिवोका जन्म लोक बस्ती में हो रहा हैं । एनी इस हालत के लिए कही न कही हम इन्सान जिमेदार हैं यह सीधी बात हम भूल जाते हैं । इन नन्हे शावक इन्सान की तरफ देख ते रहते हैं और यह बेजुबान शायद कह रहे हो की हम भी इस प्रकृति के अंश हैं ,हमे भी जिनका आधिकार हैं,हमे भी माँ की ममता की जरूरत हैं लिकिन हो सकता हैं हम ही नही सुन प् रहे हो । महाराष्ट्र में वनमंत्रलय स्वतंत्र होते हुए भी वन्य जियोकी यह दशा हो यह एक शोकांतिका हैं दूसरा क्या ?

Sunday, March 28, 2010

SAIBABA

SHIRDI WALE SAIBABA

SUNIL

Sunil dawange blog creat 28 march 2010 ,at 6:08 pm